तकलीफो का कारवाँ इतनी धूम से निकला

तकलीफो का कारवाँ इतनी धूम से निकला;
हर जख्म की आह पे आँखों से आँसू निकला;
बदन से रूह रुखसत हो सकी ना;
कहने को मेरी मय्यत पे सारा जहा साथ निकला !!

शाम खामोशी में ढलती रही

शाम खामोशी में ढलती रही;
हम तन्हाई में चलते रहे.

कभी हंसते खुद के नसीब पे;
तो कभी अंदर ही अंदर रोते रहे.

कभी शिकवा तो कभी ठोकेर मिली;
फिर भी हम उनसे मोहब्बत करते रहे.

हम जितना जाते रहे उनके पास;
वो बेवफा उतना ही हम से दूर होते रहे..!!

हमको ना मोहब्बत मिली ना प्यार मिला

हमको ना मोहब्बत मिली ना प्यार मिला; हमको जो भी मिला बेवफा यार मिला,
अपनी तो बन गयी तमाशा ज़िंदगी; हर कोई अपने मक़सद का तलबगार मिला!!