रोज साहिल से समंदर का नजारा न करो

रोज साहिल से समंदर का नजारा न करो;
अपनी सूरत को शबो-रोज निहारा न करो;
आओ देखो मेरी नजरों में उतर कर खुद को;
आइना हूँ मैं तेरा मुझसे किनारा न करो।

आडवाणी जी की कलम से (दो पैग मारने के बाद)

“मशहूर हुए वो जो कभी क़ाबिल ना थे और तो और….
कमबख़्त मंजिल भी उन्हें मिली जो दौड़ में कभी शामिल ना थे

*रामनाथ कोविन्द को समर्पित

आडवाणी जी की कलम से ( दो पैग मारने के बाद)

मेरी जिंदगी की कहानी भी बड़ी मशहूर हुई

मेरी जिंदगी की कहानी भी बड़ी मशहूर हुई;
जब मैं भी किसी के ग़म में चूर हुई;
मुझे इस दर्द के साथ जीना पड़ा;
कुछ इस कदर मैं वक़्त के हाथों मजबूर हुई।

मैंने जिसे भी चाहा अपना बनाना;
सबसे पहले वही चीज मुझसे दूर हुई;
एक बार जो गए फिर कहाँ मिले वो लोग;
जिनके बिना मेरी जिंदगी बेनूर हुई।।

मैंने कुछ इस तरह से खुद को संभाला है

मैंने कुछ इस तरह से खुद को संभाला है;
तुझे भुलाने को दुनिया का भरम पाला है;
अब किसी से मुहब्बत मैं कर नहीं पाता;
इसी सांचे में एक बेवफा ने मुझे ढाला है।